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Monday, 7 March 2016

OSHO WORLD

गंभीरता बीमारी है, यह उपाय नहीं है। यह मृत्यु तक ले जाती है, न कि अनंत जीवन तक। जीवन खेलपूर्णता, मजा है, क्योंकि सारा अस्तित्व एक विशाल सर्कस है। यह सब आमोद-प्रमोद है--रंग-बिरंगे फूल, इतने सारे सुंदर जानवर, पक्षी, बादल, और बिना किसी प्रयोजन के; उनके होने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है। जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है। जीवन स्वयं में खेल है। यह अनंत ऊर्जा है, अतिप्रवाहित ऊर्जा--अस्तित्व फैलता चला जाता है। किसी परमात्मा ने इसे नहीं बनाया है, क्योंकि जहां कहीं किसी चीज का निर्माण होता है उसका प्रयोजन होता है। जहां कभी कुछ भी किसी कारण से बनाया जाता है, और जब कोई बनाता है, बनायी गई चीज और कुछ नहीं बस मशीन ही होगी। अस्तित्व का ऐसा कोई उपयोग नहीं है, यह अनंत तक बना रहता है, ऊर्जा के अनेकानेक रूपों को अनंत खेल।
मस्ती बहुत ही पावन शब्द है, प्रार्थना से अधिक पावन। यह एक मात्र शब्द है जो तुम्हें खेलपूर्ण होने का भाव देता है, जो तुम्हें फिर से बच्चा बना देता है। तुम फिर से तितलियों के पीछे भागने लगते हो, समुद्र किनारे सीपियां, रंगीन पत्थर बीनते हो।

Thursday, 18 February 2016

OSHO WORLD THE BEGGINING

प्रश्न:- क्या आप परमात्मा को मुझ तक लाने में समर्थ हैं?

ओशो:- मेरा लेना—देना क्या? तुम हो, तुम्हारा परमात्मा है, तुम्हारी खोज है। अगर मेरे कारण तुम्हें थोड़ा सहारा मिल जाए तो बस, काफी है। उसके लिए तुम्हें अनुगृहीत होना चाहिए।

इधर तुम मुझे चुनौती दे रहे हो कि जैसे यह भी काम मेरा है। जैसे कि अगर परमात्मा तुम तक न आया तो कसूर मेरा होगा। जैसे पकड़ा मैं जाऊँगा कि तुम तक परमात्मा क्यों नहीं आया?

तुमने गुलाम होने के कितने रास्ते खोजे हैं! तुम गुलामी छोड़ते ही नहीं। कभी धन की गुलामी, कभी पद की गुलामी, अगर वहाँ से तुम बचते हो तो गुरु की गुलामी।

गुलामी का मतलब यह होता है, कोई और करे; तुम किसी और पर निर्भर हो। तुम भिखमंगे रहने की जिद क्यों